धीरे बोलो कोई सुन ना ले यह बात हम सबके कानों में पड़ी होगी और हमारे मुंह से भी
निकली होगी लेकिन सोचने की बात यह है कि यह वाक्य कब-कब हमारे मुंह से निकलता है
और कब-कब हमारे कानों में पड़ता है क्योंकि ऐसे कम ही गुप्त राज होते हैं जो
हम दूसरों के कानों में पढ़ने नहीं देना चाहते अक्सर परिवार में अशांति का कारण हम
स्वयं ही होते हैं हम इस बात को देख पाए या भले ना देख पाए पर यह असल सत्य है
क्योंकि जाने अनजाने मूर्खता वश हम खुद ही अपनी वह बातें दूसरों को बता देते हैं जो
हमें कभी नहीं बतानी चाहिए और वही बातें जो जाने-अनजाने में हमने किसी दूसरे के
सामने बता दी थी वही हमारे दुख का कारण बन जाता है वही हमारे झगड़े का कारण बन जाता
है और फिर बाद में हमें पछतावा होता है कि मुझे यह बात किसी को बतानी नहीं चाहिए थी
मेरी ही गलती हुई कि मैंने मैंने जाने अनजाने में यह बात सभी को बता दी इसीलिए
आज की यह जो बौद्ध कहानी मैं आपको सुनाने वाला हूं उसे सुनने के बाद आपको सात ऐसी
बातें पता चलेगी जो आपको कभी किसी को नहीं बतानी यह जो सात बातें हैं जो आपको किसी
को नहीं बतानी क्यों नहीं बतानी इसके पीछे का तर्क भी मैं आपको दूंगा और इन सात
बातों के अलावा अगर आपको लगता है कि कोई बात ऐसी है जो मुझसे छूट गई या मैं नहीं
बता पाया तो कमेंट सेक्शन में जरूर बताना इससे पहले कि आप इस बौद्ध कहानी में खो
जाए इस चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लें तो चलिए कहानी शुरू करते हैं एक समय की बात
है एक नगर में रामू नाम का एक युवक रहता था वो युवक बहुत गरीब था कुछ पैसा नहीं था
उसके पास दो वक्त की दाल रोटी भी बड़ी मुश्किल से उसको नसीब होती थी किसी काम की
तलाश में दिन रात खोज करने पर भी उसे कोई काम नहीं मिल रहा था फिर एक दिन उसने अपनी
पत्नी के सामने अपनी सारी समस्या बता दी उसने अपनी पत्नी को कहा कि मैं जिस जगह भी
काम मांगने के लिए जाता हूं तो हर कोई मुझे यह कहकर काम नहीं देता कि हमारे यहां
काम की जरूरत नहीं है मैं काम की तलाश कर कर के थक चुका हूं मुझे समझ नहीं आता कि
मैं तुम लोगों का पेट कैसे भरू अपने बच्चों को कैसे पा लूंगा और यह चिंता मुझे
दिन रात खाए जा रही है यह सुनकर उसकी पत्नी ने कुछ सोचकर कहा कि तुम एक आदमी के
पास सिर्फ एक बार ही काम मांगने के लिए जाते हो और जब वह काम नहीं देता तो तुम
दोबारा उसके पास जाते तक नहीं हो अगर तुम्हें उनसे काम लेना है तो तुम्हें हमदर्दी जतानी होगी तुम्हें उनसे हमदर्दी
हासिल करनी होगी अपनी गरीबी दिखानी होगी ताकि वोह लोग तुम्हारी मजबूरी समझकर
तुम्हें काम पर रख ले इसलिए शर्म मत करो उन्हें अपनी मजबूरी बताओ अपनी गरीबी बताओ
और इसी उपाय से तुम काम पा सकते हो यह बात रामू की मस्तिष्क में बैठ गई और अगले दिन
काम मांगने के लिए वह उसी सेठ के पास जा पहुंचा जहां पर वह पिछले दिन काम मांगने
के लिए गया था लेकिन इस बार उसने हाथ जोड़कर उस सेठ से प्रार्थना की उससे विनती
की कि वह बहुत गरीब है और उसे काम की बहुत आवश्यकता है वह जो कुछ भी उसे देंगे वह
उसमें संतुष्ट हो जाएगा पर कृपया करके मुझे अपने यहां काम पर रख ले उसकी यह हालत
देखकर उस सेठ ने उसे अपने यहां काम पर रख लिया वह रोज वहां पर काम पर जाने लगा अंदर
ही अंदर वह खुश तो था कि उसे काम तो मिला लेकिन उसे वेतन दूसरे लोगों से कम मिलता
था वही काम जो दूसरे लोग कर रहे थे उन्हें ज्यादा वेतन मिल रहा था और इसे कम वेतन
मिल रहा था जब इस बारे में उसने अपने सेठ से कहा तो सेठ ने कहा कि देखो भाई तुम्हें
काम की जरूरत थी मैंने तुम्हें काम दिया मेरा धन्यवाद करने की बजाय तुम मुझसे
शिकायत कर रहे हो यह कैसी बलवंत साहित है यह सुनकर रामू वहीं पर चुप हो गया बात
कहीं ना कहीं सत्य थी सच थी सेठ ने तो उसे उसकी मजबूरी के हिसाब से ही काम दिया था
और इसीलिए वह उसे अपने अनुसार ही वेतन देता था लेकिन धीरे-धीरे उसने यह बात अपने
सगे संबंधियों और अपने दोस्तों को भी बताना शुरू कर दी कि उसका सेठ कैसा आदमी
है और उसे कितना वेतन देता है समय बीतता रहा और रामू पूरी लगन के साथ अपना काम
करता रहा लेकिन अब परिस्थितियां बदलने लगी थी सेठ अब रामू से दूसरे लोगों से ज्यादा
काम लेता था और उनसे कम वेतन उसे देता था यह बात रामू के मन को बहुत खलती थी वह
दूसरों से ज्यादा मेहनत कर रहा है और उनसे कम वेतन पा रहा है इससे उसके आत्मसम्मान
को बहुत गहरी चोट पहुंची अब धीरे-धीरे उसका मन अपने काम से हटने लगा उसका मन काम
में लगता ही नहीं था जाहिर सी बात है कि ऐसी जगह किसका मन लगेगा जहां आदमी को अपने
आत्म सम्मान के साथ समझौता करना पड़े इसीलिए जल्द ही उसने अपना काम छोड़ दिया
और वह घर पर आकर खाली बैठ गया अब उसके पास घर का खर्चा चलाने के लिए भी पैसे नहीं
बचे थे इसीलिए उसने अपने सगे संबंधियों और अपने दोस्तों से सहायता मांगने शुरू की
लेकिन उसके दोस्त उसके सामने तो उसे दया का पात्र समझते थे उसे दिलासा देते थे
लेकिन पीछे से उसका मजाक उड़ाते थे वह कहते कि कितना बेवकूफ है सेठ ने इतना काम
लिया और बेचारे को पैसे भी नहीं दिए अरे हम इसको पैसे दे दें तो यह कल हमारा भी
पैसा नहीं वापस कर पाएगा इसकी ऐसी हालत है काम तो इसके पास कुछ है नहीं पैसा कहां से
लाकर देगा और इसी वजह से रामू की हालत दिन पे दिन खराब होती जा रही थी अब वह दिन रात
तनाव में रहने लगा था वही दोस्त वही सगी संबंधी जो उसके अपने होने का दिखावा करते
थे वो उसे दया का पात्र समझ रहे थे उन्हें उसके ऊपर तरस आ रहा था सब लोग आकर उसे ञान
तो बहुत देते थे लेकिन कोई सहायता नहीं करता था और अक्सर ऐसा ही होता है ञान देने
वाले तो बहुत मिल जाते हैं लेकिन मदद करने वाले उंगली पकड़कर हाथ पकड़कर आगे चलाने
वाले कितने लोग मिलते हैं फिर एक दिन उसे पता चला कि पड़ोस वाली गांव में एक बौद्ध
भिक्षु आया हुआ है जो बहुत ही ज्ञानी है रामू इतना तनाव में था कि उसे कोई रास्ता
नजर ही नहीं आ रहा था इसीलिए जाने अनजाने वह उस बौद्ध भि के पास पहुंच जाता है वहां
पहुंचकर वह सीधे उनके पैरों में गिरकर रोने लग जाता है वह रोते-रोते उन्हें अपनी
सारी परिस्थिति बताता है उसे बताता है कि किस तरह उसके सेठ ने उसका फायदा उठाया और
उसके सगे संबंधी उसके साथ कैसा व्यवहार रखते हैं सारी बातें सुनकर बौद्ध भिक्षु
ने उसे चुप कराते हुए कहा कि भंते यह सारी समस्याएं तुम्हारी बुद्धि हीनता तुम्हारी
मूर्खता के कारण उत्पन्न हुई है अगर तुम्हारे अंदर होता तो इनमें से एक भी
समस्या तुम्हारा चित्त को दुखी नहीं कर सकता था लेकिन तुमने अपने अविवेक के कारण
अपनी मूर्खता के कारण खुद ही अपने रास्ते में कांटे बिछा दिए परंतु आज मैं तुम्हें
सात ऐसी बातें बताने जा रहा हूं जो भूलकर भी किसी को मत बताना और इन बातों का
अनुसरण करते हुए तुम बाहर से मिलने वाले दुखों को तो दूर कर ही सकते हो जो बेवजह
दुनिया की वजह से तुम्हारे अंदर पन फते हैं पहली बात जो किसी को नहीं बतानी चाहिए
वो है अपनी मजबूरी अपनी मजबूरी का दिखावा करके दूसरों का दया पात्र बनाकर उनकी
सहायता लेने की गलती कभी मत करना हो सकता है कि आज वह तुम्हारी मजबूरी देखकर
तुम्हारी सहायता कर दे लेकिन कल वह तुम्हारा फायदा उठाने से भी नहीं चुके और
अगर फायदा भी नहीं उठाया तो दूसरों के सामने तुम्हारा मजाक बनाने में वह आदमी
कभी नहीं झुकेगा इसीलिए कभी भी अपनी मजबूरी का दिखावा मत करो अगर घर में दो
रोटी है सूखी रोटी है तो वहीं खाकर सो जाओ लेकिन दूसरों को इसके बारे में भनक तक
नहीं लगनी चाहिए जरा आप खुद सोचो मजबूरी बताने का क्या प्रयोजन होता है एक इंसान
का या तो वह दूसरों से सहानुभूति हासिल करना चाहता है या उनसे कोई आर्थिक मदद
चाहता है लेकिन अगर दोनों ही परिस्थितियां आप देखें तो दूसरा आदमी आपका फायदा उठाने
से नहीं चुके और अगर वह फायदा नहीं भी उठाएगा तो अपनी नजर में तो वह आपको मु
समझेगा बेवकूफ समझेगा और दूसरों के सामने आपका मजाक तो जरूर बनाएगा इसीलिए अपनी
मजबूरी के बारे में कभी किसी को मत बताना दूसरी बात जो किसी को भी नहीं बतानी चाहिए
वह है अपनी अतीत की गलतियां और भविष्य की रणनीतियां जरा सोचो कि अगर हम अपने अतीत
की गलतियां किसी दूसरे को बताते हैं तो उसका क्या प्रभाव होगा वह गलतियां ठीक तो
नहीं की जा सकती जाहिर है तो उन्हें बताने का क्या प्रयोजन रह जाता है आप अपने
अंधेरे पक्ष को खुद दुनिया के सामने बता रहे हो खुद अपनी गलतियां दूसरों के सामने
बता रहे हो इससे उस आदमी की नजर में आपका एक चरित्र घटित हो जाएगा और वह भविष्य में
हमेशा आपको उसी नजरिए से देखेगा इसीलिए किसी भी आदमी की नजर में अपना चरित्र गठित
मत होने दो और जरा सोचो कि आप व्यर्थ में ही अपने भविष्य की रणनीतियां दूसरों के
सामने बता रहे हो जो लोग आपके काम का हिस्सा ही नहीं है उनके सामने अपने भविष्य
की रणनीतियां अपनी डींगे हांकने का क्या फायदा वह लोग आपकी सहायता तो नहीं करेंगे
लेकिन आपकी भविष्य की रणनीतियों में बाधा जरूर बन सकते हैं आप खुद अपनी विवेक का
इस्तेमाल करिए और सोचिए कि आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आपने अपनी भविष्य की रणनीति
किसी को बताई हो और वह कामयाब ही ना हुई हो जरूर हुआ होगा जरा गौर से सोचिए तीसरी
बात जो किसी को नहीं बतानी चाहिए वह है अपने घर की बातें जो भी हमारे घर के अंदर
आपस में बातचीत होती है हमारे मां-बाप के साथ हमारी पत्नी के साथ हमारे बच्चों के
साथ व बातें परिवार तक ही सीमित रहनी चाहिए अगर आप इन बातों का दूसरों के सामने
ढिंढोरा पीटते हो तो दूसरों को आपके घर में घुसने का एक मौका मिल जाता है और वह
इसका फायदा उठाने से कभी नहीं चकें वह आपके परिवार के सदस्यों को आपसे दूर लेकर
जाने की कोशिश करेंगे अक्सर ऐसा होता है हम समाज में देखते हैं कि हम अपने घर के
झगड़ों को कम करने के लिए उन झगड़ों को अपने पड़ोसियों और दूसरे सगे संबंधियों को
देते हैं लेकिन इससे आपको सहायता कभी नहीं मिली होगी बल्कि आपके घर की लड़ाई झगड़े
और ज्यादा बढ़ गए होंगे और वह जाहिर है वह बढ़ेंगे अगर आप अपने मां-बाप की बात
दूसरों को बताएंगे तो आपकी मां-बाप को बुरा लगेगा यही कि हमारा बेटा हमसे बताए
बगैर दूसरों को यह बातें बता रहा है इसीलिए अपने घर की बात और अपने घर की लड़ाई झगड़े किसी के सामने
मत बताना अगली बात जो मैं आपको बताने जा रहा हूं जो किसी को नहीं बताने चाहिए वह
सुनने पर बहुत अजीब लग सकती है लेकिन उसका सत्य भी मैं आपको एक तर्क के माध्यम से
दूंगा मैं कहता हूं कि अपनी आमदनी किसी को मत बताना अब अपनी आमदनी ना बताने के पीछे
क्या प्रयोजन हो सकता है जरा सोचिए कि आप अपनी आमदनी अपने दोस्तों को बता देते हैं
तो जब आपके दोस्तों को जरूरत पड़ेगी तो वह सिर्फ आपको ही याद करेंगे क्योंकि उनको पता है कि अगर आपकी आमदनी ज्यादा अच्छी है
तो आप ही उनकी मदद कर सकते हैं और इसीलिए ज्यादा लोग आपसे सहायता मांगेंगे और जब आप
उनकी सहायता नहीं करेंगे तो वह सोचेंगे कि इस आदमी के पास पैसे हैं मेरी सहायता कर
सकते हैं लेकिन यह सहायता कर नहीं रहा है और इसीलिए आपकी आमदनी आप दोनों दोस्तों के
बीच एक झगड़े का कारण हो सकती है कम आमदनी होगी तो लोग मजाक उड़ाएंगे और ज्यादा होगी
तो सहायता मांगेंगे तो अपनी आमदनी बताने का कोई प्रयोजन नहीं है अगली बात जो मैं
आपको बताने वाला हूं उसे अपनी घाट बांध लेना और किसी को यह बात मत बताना अपनी
कमजोरी और अपनी ताकत अक्सर इंसान को पता नहीं होता है कि उसकी कमजोरी या उसकी ताकत
क्या है लेकिन अगर आपको अपनी कमजोरी और अपनी ताकत पता है तो पहली बात तो आप बहुत
ही बुद्धिमान आदमी है और दूसरी बात कि आपको यह बातें किसी से सांझा नहीं करनी
है क्योंकि अगर आपकी कमजोरियां दूसरों को पता चल गई तो वह आपकी कमजोरियों का फायदा
उठाएंगे और अगर आपकी ताकत पता चल गई तो वही ताकत आपकी कमजोरी बन जाएगी क्योंकि वह
ताकत दूसरे आदमी को पता है और वह ताकत की खाट भी ढूंढ ही लेगा अपनी कमजोरी और अपनी
ताकत अपनी पत्नी या अपने पति को भी नहीं बतानी चाहिए क्योंकि इसके बाद आपको घर में
उनसे हमेशा दबके रहना पड़ेगा अगली बात जो किसी को नहीं बतानी चाहिए व
है अपने मित्र और अपने शत्रु आप अपने मित्रों के बारे में अगर दूसरे लोगों को
बताएंगे तो वह आपके मित्रों के साथ अपनी घनिष्ठता बनाकर आपको धोखा दिलवा सकते हैं
आपके गहरे मित्रों को आपसे दूर करने का प्रयास कर सकते हैं अक्सर आम आदमी ऐसा
नहीं करता लेकिन आपके दुश्मन ऐसा करने की कोशिश कर सकते हैं और दूसरी तरफ आपके
शत्रु का भी किसी को नहीं पता लगना चाहिए क्योंकि आज जो आपका मित्र है अगर कल वह
आपका दुश्मन हो गया तो वह आपके दुश्मन के साथ ही मिलकर आपको परास्त कर सकता है आपको
धोखा दे सकता है इसीलिए अपने सबसे अच्छे दोस्तों को भी अपने दुश्मन के बारे में
कभी मत बताना अगली और आखिरी बात कहना चाहता हूं कि जब तुम दान करते हो तो दान
के बारे में भी किसी को मत बताना नहीं तो दान करना व्यर्थ हो जाता है बेकार हो जाता
है जब आप अपने दान का ढिंढोरा पीटते हो तो आप यह बता रहे हो कि मैं कितना बड़ा दानी
पुरुष हूं और यह आपके अंदर एक अहंकार निर्मित करेगा इसीलिए दान गुप्त रूप से
किया जाए उतना ही अच्छा होता है उतना ही फलदाई होता है जब आपका बाया हाथ दान कर
रहा हो तो दाएं हाथ को भी ना पता चले कि बाया हाथ दान कर रहा है यह सात बातें जो
बौद्ध भिक्षु ने रामू को बताई इनमें संसार के सभी सिद्धांत छिपे हुए हैं इन बातों का
अनुसरण करते हुए आप अपने घ में सुख शांति बना सकते हैं और घर के झगड़े हमेशा के लिए
दूर कर सकते हैं आप इन बातों के बारे में अपने विवेक से भी सोचेंगे तो आपको यह
बातें सच मालूम पड़ेंगे और हमारा कहानी सुनाने का मकसद यही है कि आपका विवेक
जागृत हो आप खुद उन बातों के बारे में सोचे जो हम आपको बता रहे हैं और अगर हम
गलत हैं तो आप कमेंट सेक्शन में वह बात जरूर बताएं जिस पर हम गलत है हमें उम्मीद
है कि आपको यह स्टोरी पसंद आई होगी अपने सुझाव हमें कमेंट बॉक्स में दीजिए
ट्रूलाइन चैनल पर आपका स्वागत है आइए नई स्टोरी शुरू करते
हैं नमस्कार दोस्तों इस मोटिवेशनल वीडियो में आज हम बात करने वाले हैं कर्मों का फल
कैसे मिलता है तो आप इस वीडियो को पूरा देखिएगा ताकि आपको अच्छे से समझ आ जाए और
चैनल को भी सब्सक्राइब कर लीजिएगा तो फिर चलिए कहानी शुरू करते हैं एक बार की बात
है तथागत गौतम बुद्ध से उनके एक शिष्य ने पूछा कि कर्म क्या है यह सुन गौतम बुद्ध
मुस्कुराए और उन्होंने जवाब देते हुए कहा कर्मों को समझने के लिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं इस कहानी को सुनने के
बाद तुम सभी यह समझ जाओगे कि कर्म क्या है गौतम बुद्ध ने कहानी शुरू की कि एक राज्य
में एक राजा राज करता था एक बार वह अपने मंत्री के साथ देश का भ्रमण करने निकला
ब्रह्मण करते करते राजा और मंत्री एक बाजार में पहुंच गया उस बाजार में राज का
ध्यान एक दुकानदार के ऊपर गया उस दुकानदार को देखते ही राजा के मन में ना जाने क्यों
यह विचार आया कि मैं इस दुकानदार को कल फांसी की सजा दे दूंगा यह बात राजा ने
अपने मंत्री को बताई मंत्री कुछ बोलते कि उससे पहले ही राजा उस दुकानदार के दुकान
के सामने से आगे निकल चुके थे और दूसरी बातें करने लगे मंत्री बहुत ही चिंतित हो
गया वह यह बात समझ नहीं पा रहा था कि आखिर दुकानदार की गलती क्या है दुकानदार से
बिना कुछ बात किए बिना कुछ सोचे समझे राजा ऐसा फैसला लेने के बारे में क्यों सोच रहे
हैं राजा और मंत्री भ्रमण करने के बाद राजमहल वापस लौट आए लेकिन मंत्री को रात
भर नींद नहीं आई सुबह जागने के बाद मंत्री एक साधारण प्रजा का रूप बनाकर उस दुकानदार
के पास गया और उस दुकानदार से पूछा तुम बेचते क्या हो दुकानदार ने जवाब दिया मैं
चंदन की लकड़ियां बेचता हूं फिर मंत्री ने आसपास के लोगों से दुकानदार के बारे में
पूछना शुरू किया सबने जवाब दिया कि दुकानदार किसी से बोलता नहीं हमेशा दुखी
रहता है मंत्री को बात समझ में आ गई वह मंत्री फिर वापस दुकानदार के पास गया और
उस दुकानदार से पूछा तुम दुखी क्यों रहते हो दुकानदार बताया मैं दुखी इसलिए रहता
हूं क्योंकि मेरे दुकान पर लोग आते हैं चंदन की लकड़ियां सूते हैं और बोलते हैं
बहुत ही सुंदर है बहुत ही अच्छी महक है लेकिन कोई खरीद नहीं इसलिए मैं बहुत दुखी
रहता हूं मंत्री को भी दुकानदार की बात सुनकर दुख हुआ उसने सोचा कि आखिर कोई भी
दुकानदार दुखी क्यों ना हो अगर उसके दुकान का कोई भी सामान खरीदा ना जाए जबकि सामान
में कोई कमी ना हो मंत्री सोचने लगा कि यह दुकानदार अपने दुखों की वजह से इतना दुखी
रहता है परंतु राजा इस दुकानदार को फांसी पर क्यों लटकाना चाहते हैं अर्थात राजा के
मन में आए हुए विचार का उत्तर अभी तक मंत्री को नहीं मिला था मंत्री ने फिर दुकानदार से पूछा भाई तब तुम क्या करोगे
अगर तुम्हारे दुकान की सारी चंदन की लकड़ियां ऐसे ही रखी कि रखी रह जाएंगी तो
दुकानदार ने गुस्से के भाव में बोला हां मैं जानता हूं कि मेरी चंदन की लकड़ियां
ऐसी ही रखी रह जाएंगी इन्हें कोई नहीं खरीदेगा इसीलिए तो मैं सोचता हूं कि हमारे
देश का राजा जल्दी से जल्दी मर जाए अगर वह जल्दी से मर जाता है तो मैं उस राज दरबार
में उस राजा के दाह संस्कार के लिए अपनी चंदन की लकड़ी दे देता जिससे मुझे कुछ
पैसे भी मिल जाते और इस बाजार के अलावा बाकी के लोगों को भी मेरे चंदन की लकड़ियों के बारे में पता चल जाता तब फिर
शायद कुछ ना कुछ लोग मेरे दुकान से चंदन की लकड़ियां खरीदने जरूर आते मंत्री
दुकानदार की बात को सुनकर सब कुछ समझ गया लेकिन मंत्री बहुत चतुर और समझदार भी था
उसके मन में एक विचार आया मंत्री ने दुकानदार से चंदन की कुछ लकड़ियां खरीद ली
इस खरीदारी से दुकानदार को कुछ पैसे भी मिल गया और वह थोड़ा खुश भी हो गया मंत्री
चंदन की लकड़ियों को लेकर वापस राज दरबार चला गया राज दरबार पहुंचकर मंत्री ने उन
चंदन की लकड़ियों को राजा के समक्ष रख दिया और बोला कि हे राजन यह चंदन की लकडि
यां उसी दुकानदार ने आपको भेंट की हैं जिस दुकानदार को आप कल फांसी देने के बारे में
सोच रहे थे राजा ने उन चंदन की लकड़ियों को सूंघ और उन्हें उन चंदन की लकड़ियों की
सुगंध बहुत पसंद आई उन्होंने कहा यह चंदन की लकड़ियां बहुत ही ज्यादा खुशबूदार हैं
दुकानदार के इस अनोखे भेंट से राजा बहुत खुश हुए और मंत्री को कुछ स्वर्ण मुद्राएं
देकर बोला जाओ उस दुकानदार को यह स्वर्ण मुद्राएं इनाम में दे देना और बोलना कि आज
के बाद महल में जब कभी भी चंदन की लकड़ी की जरूरत पड़ेगी तब तुम्हारी दुकान से ही चंदन की लकड़ी ली जाएगी यह बात सुनकर
मंत्री मुस्कुराने लगे तथा सोचने लगे कि अब तो राजा मन में उस दुकानदार को फांसी
देने का विचार आ ही नहीं सकता क्योंकि अब तो हमेशा राज्य दरबार के लिए चंदन की
लकड़ियों के इंतजाम की जिम्मेदारी उस दुकानदार को मिल गई है मंत्री स्वर्ण
मुद्राओं को लेकर वापस दुकानदार की तरफ चल पड़ा इधर राजा इस विचार में पड़ गया कि वह
दुकानदार तो बड़ा ही अच्छा इंसान है जिस वक्त मैं उसके बारे में यह सोच रहा था कि
मैं इसको कल फांसी देता हूं शायद उसके मन में ही उस समय यही विचार चल रहा था कि
राजन पहली बार मेरे दुकान के सामने आए हैं क्यों ना मैं उनको अपनी सुंदर और खुशबूदार
लकड़ियों को भेंट करूं और आज उसने मुझे भेंट भी किया बेवजह ही मैं उसको फांसी
देने के बारे में सोच रहा था इधर मंत्री दुकानदार के पास पहुंच गया मंत्री ने राजा
के द्वारा दिए गए स्वर्ण मुद्राओं को दुकानदार को देते हुए कहा कि जिन चंदन की लकड़ियों को कल मैं खरीद कर ले गया था उन
चंदन की लकड़ियों को राजा ने बहुत पसंद किया और इनाम के तौर पर तुम्हारे लिए
यशवंत मुद्राएं भिजवाई हैं यशवंत मुद्राएं लेकर दुकानदार बहुत खुश हुआ साथ ही साथ
मंत्री ने उस दुकानदार को यह भी बताया कि अब आज के बाद राज दरबार में जब कभी भी
चंदन की लकड़ियों की जरूरत पड़ेगी तो सारी चंदन की लकड़ियां तुम्हारी दुकान से ली जाएंगी दुकानदार मंत्री की बात सुनकर बहुत
ही खुश हो गया मंत्री ने दुकानदार से पूछा क्यों भाई तुम तो राजा के बारे में इतना
बुरा भला सोचते थे लेकिन देखो राजा तुम्हारी कितनी चिंता करते हैं राजा कितनी
अच्छे हैं राजा अपनी प्रजा के बारे में कभी भी गलत नहीं सोचते दुकानदार मंत्री की
बात से सहमत हो गया और बहुत दुखी होकर राजा के प्रति अपने बुरे विचार पर
पश्चाताप करने लगा दुकानदार ने मंत्री से बोला कि मैं कितना गलत सोचता था राजा के
बारे में राजा तो बड़े ही अच्छे हैं बड़े ही भोले राजा हैं भगवान करे कि राजा की
बहुत ही लंबी हो यह बात सुनकर मंत्री भी बहुत खुश हुआ फिर मंत्री वहां से वापस राज
दरबार को चला गया और यहीं पर तथागत गौतम बुद्ध ने इस कहानी को समाप्त करते ही अपने
शिष्यों से पूछा कि अब आप ही लोग बताओ कि कर्म क्या है किसी शिष्य ने कहा कर्म बोले
हुए वह शब्द है किसी शिष्य ने कहा कर्म वाणी है तो किसी ने कहा कर्म सोच है तो
किसी ने कहा कर्म भावना है वगैरह वगैरह अपने सारे शिष्यों के जवाब सुनने के बाद
महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा कि इंसान के विचार ही उसके कर्म हैं हमारे विचार जैसे
रहेंगे हम वैसे ही कर्म करेंगे और उन्हीं विचारों के द्वारा किए हुए कर्म में हमारे
सुख और दुख के लिए उत्तरदाई होते हैं अर्थात अगर हमारे विचार ही गलत है तो
हमारे द्वारा किए हुए कर्म भी गलत ही होंगे और उनका परिणाम भी गलत ही निकलेगा
जिसके परिणाम स्वरूप हम दुखी रहेंगे अगर हमारे विचार सही रहेंगे तो हम सही कर्म
करें सही कर्म करेंगे तो फिर सही फल मिलेगा जिससे हमारे जीवन में सुख आता है फिर
बौद्ध भिक्षु ने आगे कहा अब हम कर्म को थोड़ा आसान भाषा में समझने की कोशिश करते
हैं कर्मों का अर्थ है कार्य इस दुनिया में इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी काम हो
रहा है वह सब एक कर्म है असल में देखा जाए तो कर्म क्रिया और प्रतिक्रिया के साधारण
से सिद्धांत को फॉलो करता है हम जो भी कार्य करते हैं वह एक कर्म है और फिर
क्रिया और प्रति के सिद्धांत के अनुसार हर कर्म का एक परिणाम भी होता है जैसे कांच
के गिलास को फेंकना एक कर्म है और उसका टूट जाना उसका परिणाम अत्यधिक बारिश होना
एक कर्म है और बाढ़ आना उसका परिणाम असल में परिणाम हमारे हित में होगा या अहित
में यह पूरी तरीके से हमारे द्वारा किए गए कार्य पर निर्भर करता है ज्यादातर लोग यह
सोचते हैं कि ऊपर आसमान में कोई बैठा है जो निर्णय लेता है कि किसके जीवन में सुख
देना है और किसके जीवन में दुख जबकि असल में हमारे कर्म और फिर उनके द्वारा मिलने
वाले परिणाम ही हमारे सुख और दुख को निर्धारित करते हैं इसीलिए हमारी भारतीय
परंपरा में यह कहा जाता है कि आप अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है असल में कर्म
का परिणाम ही भाग्य है और हमें कैसे कर्म करने हैं यह पूरी तरीके से हमारे हाथ में
होता है तो जब कोई अच्छा कर्म करता चला जाता है तो उसका भाग्य भी अच्छा होता चला
जाता है जैसे अगर दो बच्चे हैं और उसमें से एक बच्चा बचपन से ही नई चीजों को सीखने
और जानने का प्रयास करता रहता है व हमेशा ही जो भी करता है उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ
योगदान देने की कोशिश करता है और जो दूसरा बच्चा है वो ना तो किसी नई चीज के बारे
में सीखने और जानने का प्रयास करता है और ना ही किसी काम को पूरे मन से करता है तो
समय बीतने के साथ वो पहला वाला बच्चा अपने जीवन में काफी सफल इंसान बन जाता है जबकि
दूसरा बच्चा सालों बाद भी अपने जीवन में संघर्ष कर रहा होता है अब यहां पहले बच्चे
को देखकर दूसरा बच्चा बड़े ही आसानी से यह कह देगा कि उसकी तो किस्मत ही अच्छी थी
लेकिन नहीं असल में उसके कर्म अच्छी थी जिसके परिणाम स्वरूप उसकी किस्मत भी अच्छी होती चली गई तो अगर हम चाहे तो अपने
कर्मों को बदलकर अपना भाग्य बदल सकते हैं सीधी सी बात है जैसे ही आप अपने कर्म बदलो
ग आपका भाग्य बदलना शुरू हो जाएगा और यह दोनों ही परिस्थितियों में सही है अच्छे
के लिए भी और बुरे के लिए भी लेकिन असल में कोई इंसान कैसे कर्म करता है यह मुख्य
रूप से उसके माता-पिता परिवार समाज और आसपास के माहौल पर भी निर्भर करता है
ज्यादातर केसेस में एक एक्टर का बेटा एक्टर बनने की ही कोशिश करता है इंजीनियर
का बेटा इंजीनियर और डॉक्टर का बेटा डॉक्टर इसका कारण यह है कि हमारा शरीर और
मन अपने आसपास से ही सूचना इकट्ठा करते हैं और हम हमारे अंदर मौज सूचनाओं और
ज्ञान के आधार पर ही कोई कार्य करते हैं और फिर हमें उसी के अनुसार परिणाम भी
मिलते हैं असल में हम अपने रोज के कामों का 99 पर अनकॉन्शियस तरीके से करते रहते
हैं क्योंकि हमारा शरीर और मन प्राप्त सूचनाओं को याद रखता है और फिर उन्हें
दोहराता रहता है जैसे जब हम कार चलाना सीख रहे थे तब हम एकदम पूरी कॉन्शसनेस के साथ
हर चीज पर ध्यान रख रहे थे कि स्टीयरिंग कहां है कहां है लेकिन कुछ समय बाद हम बात
करते हुए या कुछ भी सोचते हुए बड़ी आसानी से कार चला पाते हैं क्योंकि अब हमारे
अंदर कार चलाने की प्रोग्रामिंग हो चुकी है और हम लगभग अपने सारे काम इसी तरीके से
करते हैं बिना किसी जागरूकता के बस वह काम होते चले जाते हैं क्योंकि हमारे काम बिना
किसी जागरूकता के हो रहे हैं इसलिए हमें लगता है कि हमें कोई चला रहा है कोई अदृश्य शक्ति है जबकि असल में हमारे कर्म
ही अब हमारी आदत बन चुके हैं अगर मैं अपने ज्यादातर काम जागरूक होकर करने लगे तो
पाएंगे कि हमारा भाग्य हमारे ही हाथ में है क्योंकि जागरूकता की वजह से हमारे
कर्मों पर हमारा पूरा नियंत्रण हो जाता है जैसा कि ऊपर की कहानी में गौतम बुद्ध ने
कहा था कि हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं और जागरूकता की अवस्था में हमारा हमारे
विचारों पर पूरा नियंत्रण हो जाता है विचारों के नियंत्रण से हम कर्म में भी
अंतर हासिल कर लेते हैं और फिर जब हमारे कर्म हमारे हिसाब से होंगे तो उनका परिणाम
भी उसी के अनुरूप ही होगा इसीलिए गौतम बुद्ध ने चित्त के नियंत्रण पर जोर दिया
है कि जब किसी इंसान का चित्त ही शुद्ध हो जाएगा तो उसके मन में बुरे विचार कैसे
आएंगे और फिर वह बुरे कर्म ही कैसे करेगा इसीलिए गौतम बुद्ध का पूरा ज्ञान चित की
सुविधा पर जोर देता है हमें उम्मीद है कि आपको यह स्टोरी पसंद आई होगी अपने सुझाव
हमें कमेंट बॉक्स में दीजिए ट्रू लाइन चैनल पर आपका स्वागत है आइए नई स्टोरी शुरू करते
हैं स्वार्थी यानी कि स्वयं का अर्थ जो इंसान स्वयं का अर्थ जानना चाहता है जो
खुद को समझना चाहता है क्या वह इंसान आपकी नजर में गलत है हम जब भी किसी को स्वार्थी
कहते हैं तो उसका मतलब तो यही होता है कि वह आदमी स्वयं का अर्थ समझना चाहता है तो
फिर वह गलत कैसे हुआ स्वार्थी शब्द दुनिया की नजर में समाज की नजर में एक अलग ही
नजरिए से समझा जाता है अक्सर हम अपने आसपास ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो
स्वभाव से बहुत अच्छे प्रतीत होते हैं यानी कि सब लोगों की मदद करते हैं सबसे
अच्छा व्यवहार रखते हैं लेकिन इसके साथ हमने यह भी देखा होगा कि ऐसे लोग जो
स्वभाव के अच्छे हैं दूसरों की मदद करते हैं वह दुखी भी ज्यादा रहते हैं और जो लोग
स्वार्थी होते हैं वह फलते फूलते चले जाते हैं तो ऐसे में परमात्मा की सत्ता पर
उंगली उठना निश्चित है लेकिन अगर यह सत्य है तो हमें कौन सा मार्ग अपनाना चाहिए
क्या हम भी दूसरों के जैसे बन जाएं पता नहीं आप में से कितने लोग यह मानते हैं कि अच्छे लोग जीवन में बहुत दुखी रहते हैं
लेकिन इसके पीछे का सत्य क्या है अगर हम इसके पीछे का सत्य नहीं जानेंगे नहीं
पहचानेंगे तो कहीं ना कहीं हमारा अवचेतन मन भी बुराई की तरफ झुक जाएगा इसीलिए अपने
मन में ऐसे विचार पनपने से पहले इस बात की पूरी सच्चाई पूरा निष्कर्ष निकाल लें ताकि
भविष्य में आपको अपने अच्छे होने पर पश्चाताप ना हो दुख ना हो आज की जो बौद्ध
कहानी मैं आपको सुनाने वाला हूं उसमें आपको पांच ऐसे तरीके पता चलेंगे जिसके
माध्यम से अगर आप कर्म करते हैं तो आप अच्छे कर्म भी कर पाएंगे और दुखी भी नहीं होंगे इससे पहले कि आप इस कहानी में खो
जाएं इस चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर ले तो फिर चलिए कहानी शुरू करते हैं एक गांव में
आनंद नाम का एक युवक रहता था उसका भरा पूरा पूरा परिवार था उसके दो बच्चे थे
उसकी पत्नी थी लेकिन उसके माता-पिता इस दुनिया से चल बसे थे इसीलिए पूरे परिवार
की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी बच्चे अपनी पढ़ाई करते थे और उसकी पत्नी अपने घर
गृहस्थी के कामों के साथ गाय भैंस बकरी इत्यादि का दूध बेच बेच कर अपना घर चलाते
थे और आनंद पहाड़ में पत्थर तोड़ने का काम करता था बहुत ही मेहनत भरा काम था पूरे
दिन काम करता तो रात को थककर घर पर वापस लौट लेकिन इतनी मेहनत करने के बाद भी अगर आनंद
को गांव का कोई भी आदमी मदद के लिए बुलाता तो आनंद कभी भी मना नहीं करता था उसके
जीवन का एक ही सिद्धांत था कि अगर मैं दूसरों की मदद करूंगा तो परमात्मा मेरा साथ देंगे परमात्मा मेरे साथ कुछ बुरा
नहीं होने देंगे आनंद अपने इस सिद्धांत का पालन बहुत ही कढ़ाई के साथ करता था वह इस
सिद्धांत पर इतना विश्वास करता था कि अगर कोई बाहर का आदमी उससे मदद मांगले
तो वह अपने घर का काम भी अधूरा छोड़कर उस आदमी की मदद करने के लिए पहुंच जाता था
जिस वजह से उसकी पत्नी बहुत परेशान रहती थी वह अक्सर आनंद को समझाने की कोशिश करती
थी कि सबसे पहले अपना काम करो अपने परिवार को देखो दोदो बच्चे हैं हमारे और फिर भी
तुम दूसरों के काम करने में लगे रहते हो अरे अपने घर को तो संभालो अपना घर संभल
नहीं रहा दूसरों की मदद करने चले हैं और जब ऐसी ऐसी बातें आ आनंद के कानों में
पड़ती तो उसके हृदय में कांटा सा चुभने लगता था और उन दोनों में लड़ाई झगड़ा शुरू
हो जाता था अक्सर उनके लड़ाई झगड़े का यही सबसे बड़ा कारण होता था लेकिन ना तो आनंद
अपने आप को बदल पाया और ना ही उसकी पत्नी ने उसको समझाना कभी बंद किया इसी वजह से
आए दिन उनके घर में कलेश होता रहता था जहां तक उस गांव वालों की बात थी तो वह
आनंद के स्वभाव को जानते थे और वह जानबूझकर जो काम आसान भी होता था जो उनके
सामर्थ्य में भी होता था उस काम के लिए भी वह आनंद को बुलाते थे ताकि उन्हें कम
मेहनत करने पड़े कहने का अर्थ यह है कि गांव वाले आनंद की इस बलम साहस का फायदा
उठाते थे लाभ उठाते थे और सब पीछे से उसका मजाक उड़ाते थे उसे बेवकूफ कहते थे ऐसे ही
समय बीतता रहा और एक दिन आनंद की पत्नी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गई आनंद से जो कुछ
भी सेवा हो सकती थी उसने वो सब अपनी पत्नी के लिए किया उसने गांव के वैद को बुलाकर
अपनी पत्नी की जांच करवाई लेकिन यह रोग उस वैद की पकड़ के बाहर था इसीलिए उस वैद ने
कहा कि तुम अपनी पत्नी को नगर में जाकर किसी बड़े वैद को दिखाओ तो तुम्हारी पत्नी
की जान बच सकती है जल्द से जल्द नगर पहुंचने की व्यवस्था करो नहीं तो तुम्हारी
पत्नी के प्राण संकट में हो जाएंगे यह सुनकर आनंद के पैरों तले जमीन फिसल गई
उसने यह नहीं सोचा था कि उसकी पत्नी के प्राण संकट में वह सोच रहा था कि कोई
साधारण सा रोग होगा जिसका इलाज हो जाएगा लेकिन जब उसने वेद की यह बात सुनी तो वह
घबरा गया अब पत्नी को नगर तक कैसे लेकर जाए क्योंकि उसके पास इतना धन नहीं था कि
वह अपनी पत्नी के लिए एक घोड़ा गाड़ी करके उसमें अपनी पत्नी को लिटा करर नगर में ले
जा सके उसकी पत्नी की हालत बिल्कुल चलने की भी नहीं थी इसलिए उसे नगर पहुंचाने के
लिए किसी घोड़ा गाड़ी की जरूरत थी संयोग से उस के पड़ोसी धनु के पास एक घोड़ा गाड़ी थी वह अक्सर व्यापार के लिए अपनी
घोड़ा गाड़ी नगर में लेकर जाया करता था इसीलिए आनंद के मन में विचार आया कि मैं धनु की घोड़ा गाड़ी ले सकता हूं मैं धनु
की इतनी मदद करता हूं कभी उसके काम को नहीं टाल तो वह तो मेरे काम को कभी मना ही
नहीं कर सकता और यही सोचकर वह घोड़ा गाड़ी लेने के लिए धनु के पास पहुंच जाता है
लेकिन धनु बहुत ही चालाक इंसान था वह बिना किराए के अपनी घोड़ा गाड़ी अपने सगे
बंधिया के लिए भी नहीं ले जाता था तो आनंद की तो दूर की बात रहे जब आनंद ने उसे
घोड़ा गाड़ी के बारे में पूछा तो उसने यह कहकर उसका यह काम टाल दिया कि मेरे घोड़े
बहुत ज्यादा बीमार हैं वह शायद बच भी मुश्किल से पाएंगे पांच दिनों से वह कुछ
नहीं खा रहे तो ऐसे में बेचारा घोड़ा गाड़ी लेकर कहां नगर तक पहुंच पाएगा हां
अगर तुम कुछ धन की व्यवस्था कर सकते हो तो मैं अपने एक मित्र की घोड़ा गाड़ी तुम्हारे लिए मंगवा सकता हूं यह सुनकर
आनंद परेशान और चिंतित हो गया क्योंकि उसके पास धन तो था ही नहीं इसका मतलब उसकी
पत्नी बड़े नगर में वैद के पास इलाज के लिए पहुंच ही नहीं पाएगी उलझन भरे हुए
विचार लिए हुए जब आनंद वापस आ रहा था तो उसने एक दिल को झंझोट देने वाला दृश्य
देखा उसने देखा कि धनु के घोड़े जो धनु के अनुसार बीमार थे और कुछ खा भी नहीं रहे थे
वही घोड़े गा का ही एक युवक उसकी बांट से खोलकर बाहर ला रहा था और गाड़ी में उसको
जोत रहा था यह देखकर पहले तो आनंद को कुछ समझ में नहीं आया उसके बाद जब आनंद ने उसी
युवक से पूछा तो उसने बताया कि धनु ने यह घोड़ा गाड़ी उसे किराय पर दी है यह सुनकर
आनंद का दिल टूट गया उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका सबसे अच्छा मित्र
धनु उसके साथ ऐसा कर सकता है हालांकि यह इस बात पर दुखी होने का वक्त नहीं था
इसीलिए आनंद व से जल्दी से लौट जाता है और गांव के ही एक सेठ के पास जाकर कुछ धन
उधार लेकर धनु को दे देता है धनु अपने मित्र की घोड़ा गाड़ी मंगवा देते हैं
जिसके बाद वह अपनी पत्नी को वैध के पास नगर में ले जाता है जब उसकी पत्नी का इलाज
चल रहा था तो आनंद यही सोच रहा था कि एक वह दिन था जब धनु की बेटी बीमार हो गई थी
और धनु यहां पर नहीं था तो मैं पूरी रात वैद्य जी के पास उसके लिए बैठा रहा था उस
उसकी देखरेख की थी उसकी सेवा की थी इतने दिनों तक धनु नहीं आया था तब मैं ही उसके
परिवार की देखरेख किया करता था हाय कैसा दुर्भाग्य है यह जिसके लिए मैंने इतना कुछ
किया उसने एक घोड़ा गाड़ी देने से मुझे मना कर दिया और वह भी तब जब मेरी पत्नी
जिंदगी और मौत के साथ खेल रही थी कुछ देर बाद वैद बाहर आकर आनंद को एक बहुत बुरी
खबर देता है वह आनंद को बताता है कि उसकी पत्नी को कर्क रोग हो चुका है और इसका कोई
भी इलाज नहीं है उसके पास कुछ समय ही शेष बचा है यह सुनकर आनंद दुखी होकर वही जमीन
पर बैठ गया उसकी पूरी दुनिया उजड़ने वाली थी और उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था
कुछ समय बाद उसकी पत्नी चल बसी और अब दोनों बच्चों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर
आ गई थी लेकिन यहां पर आनंद के सारे सिद्धांत टूट चुके थे उसके सारे भ्रम खत्म
हो चुके थे अब उसके दिमाग में एक ही बात थी कि अच्छा कर्म करने से परमात्मा साथ
नहीं देता बल्कि बुरे लोग फलते फूलते हैं और इस बात का मैं सबसे बड़ा गवाह हूं यह
विचार अक्सर उसके दिमाग में चलते रहते थे और इसी वजह से उसका मन धीरे-धीरे सन्य स्त
हो गया देश दुनिया से दूर हट गया और एक दिन ऐसा भी आया जब वह अपने बच्चों को अपने
रिश्तेदारों के पास छोड़कर इस देश दुनिया को त्याग कर एक सन्यासी बनने के लिए घर से
निकल पड़ा उसने गांव में किसी को कुछ नहीं बताया किसी को नहीं पता था कि आनंद अचानक
कहां गायब हो गया सन्यास की दीक्षा लेने के लिए वह एक बौद्ध भिक्षु के पास पहुंचता
है और भिक्षु उस समय ध्यान में बैठे हुए थे ध्यान से बाहर आने के बाद वह बड़े
ध्यान से आनंद के चेहरे को देखते हैं और उससे सन्यासी बनने का कारण पूछते हैं इस
पर आनंद उन्हें अपनी पूरी आपबीती सुना देता है और कहता है कि हे गुरुदेव इस
दुनिया से मुझे कुछ भी हासिल नहीं हुआ मेरा मन इस दुनिया से विरक्त हो चुका है
जब अपने दोस्तों ने ही मेरा साथ नहीं दिया तो इस दुनिया में रहने का क्या मतलब और इसी वजह से मैं सन्यासी बनना चाहता हूं यह
सुनने के बाद बौद्ध भिक्षु ने उपदेश देना शुरू किया उन्होंने कहा कि याद रखना बनते
जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनना तुम्हें परम सुख तक कभी नहीं पहुंचा सकता परमानंद
तक कभी नहीं पहुंचा सकता तुम दुनिया से अपने मन पर बोझ लेकर भी रखे हुए हो तुम
दुनिया से परमात्मा की खोज करने के लिए विरक्त नहीं हुए हो इस भ्रम में कभी मत रहना तुम संसार से विरक्त हुए हो क्योंकि
संसार ने तुम्हें धोखा दिया ऐसा तुम्हें लगता है इसीलिए तुम परमात्मा पर कभी
विश्वास नहीं कर पाओगे और ना ही उन पर अपनी पूर्ण आस्था बना पाओगे इसीलिए
सन्यासी होने का भी तुम पूरा लाभ कभी नहीं उठा पाओगे सन्यासी होने का लाभ तब मिलता
है जब हमारे प्रभु में परमे श्वर में परमात्मा में पूर्ण आस्था बन जाती है मैं
तुमसे पूछता हूं क्या तुम्हारी आस्था परमात्मा में है यह सुनकर आनंद कहता है कि हे गुरुदेव मैं तो दुनिया देखकर आया हूं
कि जो बुरे कर्म करता है वह फलता फूलता है और जो अच्छा काम करता है उसे प्रभु कुछ भी नहीं देता परमात्मा उसे दुख ही दुख देता
है इसीलिए मैं परमात्मा पर अपनी पूर्ण आस्था कैसे बना सकता हूं यह सुनकर उस बोध
भिक्षु ने कहा कि यही तो यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं कि तुम पूरी
ऊर्जा अपनी सन्यासी जीव में लगाओ और उसके बाद भी तुम्हें फल प्राप्त ना हो तो
तुम्हें कैसा लगेगा इसीलिए किसी की भी मदद करने के यह मैं पांच सिद्धांत तुम्हें
बताता हूं यह पांच सिद्धांत समझकर संसार में वापस लौट जाओ और संसार में एक ग्रस्त
जीवन जयो उसके बाद ही सन्यासी जीवन का उदय होता है जब हम अपने ग्रस्त जीवन को पूर्ण
रूप से समझ लेते हैं और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर देते हैं फिर यह सब कहने के बाद बौद्ध भिक्षु ने आगे
कहा जब तुम किसी की सहायता करते हो किसी की मदद करते हो तो उसमें सबसे पहली बात
सबसे पहला सिद्धांत जो ध्यान में रखने का होता है वो होता है कि किसी की मदद करते
वक्त किसी की सहायता करते वक्त कभी भी उससे उम्मीद मत रखना यह मत सोचना कि आज
मैंने इसकी सहायता कर दी मदद कर दी तो कल बदले में यह भी मेरी सहायता करेगा मेरी मदद करेगा अगर तुम ऐसा सोचोगे तो तुम्हें
जीवन में दुखों का सामना करना ही पड़ेगा क्योंकि एक नहीं तो दूसरा या दूसरा नहीं
तो तीसरा कोई ना कोई तुम्हारी उम्मीद जरूर तोड़ेगा और वास्तविकता में वह मदद या वह
सहायता सहायता नहीं होती है वह हमारे लालच का ही एक रूप होता है हम उसकी सहायता या
मदद निर्भावने मन में लालच का भाव है हमारे मन
में बदले का भाव है हम यह सोचकर मदद करते हैं कि इसकी मदद कर देता हूं तो कल यह
मेरे भी मदद करेगा और यही लालच हमें अक्सर उन लोगों की मदद करने पर विवश करता है जो
किसी ना किसी रूप में धनवान होते हैं क्योंकि हमें लगता है कि कल यह आदमी धन के
द्वारा मेरी मदद कर सकता है और इसीलिए जिस इंसान को वास्तविकता में मदद की आवश्यकता
है हो सकता है वह गरीब हो लेकिन हमारा मन अपने लालच के वशीभूत होकर उसकी मदद कभी
नहीं करेगा इसीलिए किसी की मदद और किसी की सहायता करने के अपने विचार को विस्तार दो
केवल एक प्रकार के वर्ग के लिए अपनी सहायता या अपनी मदद पेश मत करना वह सबके
लिए समान होनी चाहिए जरा सोचो एक तरफ तुम्हारा मित्र हो जिसके पास धन है संपदा
है और दूसरी तरफ कोई गरीब औरत हो जो भूखी बैठी हुई है तुम्हारा दोस्त तुमसे कहता है
कि यार आज तो खाने के लिए अच्छे भोजन मंगवा लो बाजार से और दूसरी तरफ वह औरत तुमसे दो सूखी रोटी मांग रही है तो तुम
किसकी मदद करोगे कौन मदद का हकदार सबसे पहले है सबसे पहले हमारा कर्तव्य बनता है
कि उस औरत की भूख मिट जाए लेकिन अक्सर इंसान ऐसे नहीं सोचता वह अपने दोस्त को तो
खिला देगा उसको तो बाजार से बहुत महंगी वस्तु मंगा के दे देगा लेकिन किसी गरीब को
उसकी भूख मिटाने के लिए पैसा या धन नहीं देगा दूसरी बात जो ख्याल में रखने की है
वह यह कि सहायता करते वक्त हमारा लालच कभी भी उसके साथ नहीं जोड़ना चाहिए अक्सर हम
जब किसी की मदद करते हैं तो हमारा लालच और हमारा स्वार्थ उसके साथ जुड़ा होता है और
हम अपनी भविष्य की योजना तैयार करके उस आदमी की मदद करते हैं हम यह सोचते हैं कि
अगर मैं इसका यह काम करूंगा तो भविष्य में यह आदमी मेरा वह काम पूरा कर देगा और वह
सहायता वह मदद बिल्कुल भी परमात्मा के द्वार को नहीं खटखटा क्योंकि वह लालच है
जाहिर है आप अपने आप को धोखा देने के लिए अपने लालच को एक सहायता एक मदद का रूप दे
रहे हैं तीसरी बात जो ख्याल रखने की है व यह कि अपने सामर्थ्य के हिसाब से दूसरे की
मदद करो कभी भी एक ग्रस्त आदमी को किसी की इतनी सहायता नहीं करनी चाहिए जिससे कि
उसका परिवार और उसके बच्चे कष्ट में जीवन बिताएं सबसे पहला फर्ज हमारा होता है अपने
परिवार को सुखी रख उनकी जरूरतें पूरी करना और उसके बाद दूसरों की मदद करना आता है
लेकिन कुछ लोग दूसरों की मदद पहले करते हैं और अपने परिवार को तवज्जो कम देते हैं जिससे कि परिवार में लड़ाई झगड़े आए दिन
पनपते रहते हैं और यह सब हम समाज में देखते रहते हैं आसपास अगली बात जो ख्याल
में रखने की होती है वह यह है कि अपना कर्म अपनी जिम्मेदारियां पहले निभानी होती
है हम अपना कर्म अपना काम छोड़कर पहले दूसरों की मदद करने के लिए चले जाते हैं
और जब दूसरा बदले में हमारी मदद नहीं करता तो हमारा दिल दुखी हो जाता है हम सोचते
हैं कि मैंने तो अपना काम छोड़कर उस आदमी की मदद की थी और वह आदमी मेरी मदद ही नहीं
कर रहा है इसीलिए अपना कर्म सर्वोपरि अपना कर्म सबसे ऊपर क्योंकि वही काम करने के
लिए इस दुनिया में हमारा जन्म हुआ है और सबसे आखिर में जो बात समझने की है वह यह
कि परमात्मा की मर्जी से ही सब कुछ होता है हमारा कर्तव्य है अपने कर्म को करते
जाना करनी धरनी तो ऊपर वाले के हाथ में है इसीलिए जो कुछ भी होता है सब ऊपर वाले पर
छोड़ दो अगर तुम्हें कोई धोखा भी देता है तो यह समझ के चलो कि वह सब ऊपर वाले की
करनी होती है आप यह मान के चलो कि मैं करता नहीं हूं मैं तो एक माध्यम हूं
करवाने वाला तो वह है उसके सामने किसकी मर्जी चली जब यह आस्था यह विश्वास हमारे
मन में पनपने लगता है तो हमारी सारी शिकायतें दूर हो जाती हैं क्योंकि इस
दुनिया में जो भी होता है अच्छे के लिए होता है जो भी हो रहा है अच्छे के लिए हो
रहा है और जो भी होगा अच्छा ही होगा चाहे हमारी बुद्धि आज वर्तमान में इस सिद्धांत
को ना समझ पाए लेकिन जीवन में कभी ना कभी किसी ना किसी मोड़ पर आपको जरूर यह एहसास
होगा कि जो हुआ था वह अच्छे के लिए ही हुआ था इसीलिए सारी शिकायतें दूर कर दो और बस
अपना कर्म करते जाओ अपने ग्रस्त जीवन को पूर्ण रूप से जी लो और उसके बाद ही
सन्यासी जीवन की यव होती है इसके बाद बौद्ध भिक्षु ने आनंद को कहा कि वापस अपने
गांव लौट जाओ अपनी बेटियों को वापस लेकर कर आओ उन्हें पालो पोशो अपने बच्चों को
वापस लेकर आओ दूसरी शादी कर लो लेकिन बच्चों का पालन पोषण अच्छे तरीके से करो
यह सुनकर आनंद अपने बच्चों के साथ अपने गांव में वापस लौट आता है गांव में किसी
को खबर नहीं थी कि आनंद कहां पर गया हुआ था और वह क्या ज्ञान लेकर वापस लौटा है
लेकिन अगले दिन सुबह-सुबह गांव वालों ने आनंद के चेहरे पर एक अलग ही आनंद एक अलग
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